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Monday, 12 January 2026

पोंगल (मकर संक्रांति) का पर्व – एक साहित्यिक वर्णन

   


पोंगल अथवा मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत पावन एवं उल्लासपूर्ण पर्व है। यह पर्व सूर्यदेव को समर्पित है और प्रकृति, कृषक तथा परिश्रम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रतीक माना जाता है। जब सूर्य उत्तरायण होता है, तब यह त्योहार जीवन में नवचेतना, आशा और समृद्धि का संदेश लेकर आता है।

दक्षिण भारत में इसे पोंगल के नाम से बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से किसानों से जुड़ा हुआ है, क्योंकि नई फसल के आगमन पर धरती माता, सूर्यदेव और पशुधन के प्रति आभार प्रकट किया जाता है। घर-आँगन को स्वच्छ कर रंगोली से सजाया जाता है और नए वस्त्र धारण किए जाते हैं।

पोंगल के दिन मिट्टी के बर्तन में दूध और चावल पकाए जाते हैं। जब दूध उफनता है, तो “पोंगलो पोंगल” का जयघोष किया जाता है, जो समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक है। यह क्षण मानो यह संदेश देता है कि जीवन भी परिश्रम और धैर्य से परिपूर्ण होकर सुख-समृद्धि से भर उठता है।

मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का प्रतीक है, जहाँ मनुष्य प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर कृतज्ञता, परंपरा और सामूहिक आनंद का अनुभव करता है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि परिश्रम का फल मीठा होता है और प्रकृति का सम्मान ही जीवन की सच्ची समृद्धि है।

 

 


पोंगल और मकर संक्रांति पर सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही जीवन में नई आशा, परिश्रम का सम्मान और समृद्धि का उजास फैल जाता है।

यह पर्व प्रकृति और कृषक के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है, जहाँ अन्न, श्रम और संस्कृति एक साथ उल्लास बनकर खिल उठते हैं।

1. शीर्षक: “उत्तरायण” — सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की काव्य-भावना से प्रेरित
सूर्य के उत्तरायण होते ही पोंगल और संक्रांति
परिश्रम, प्रकाश और नवजीवन का गीत गुनगुनाती है।

2. शीर्षक: “धरती की कृतज्ञता” — महादेवी वर्मा की संवेदनात्मक शैली से प्रेरित
पोंगल और संक्रांति धरती की मौन प्रार्थना हैं,
जहाँ अन्न, श्रम और मनुष्य एक-दूसरे के ऋणी बन जाते हैं।



Thursday, 26 January 2023

भारतभूषण अग्रवाल - प्रयोगवाद के प्रमुख कवि

 


भारतभूषण अग्रवाल का जन्म सथुरा में तुलसी जयंती के दिन हुआ।  उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की और बाद में दिल्ली विश्व-विद्यालय से पी.एच.डू का उपाधि प्राप्त की। आजीविका के लिए उन्होंने रुचि के अनेक कार्य किए। सर्वप्रथम उन्होंने समाज सेवक पत्रिका (कलकत्ता से प्रकाशित) का संपादन किया।  1942 से 1947 ई तक उद्योग व्यवस्था में उच्च पदस्थ कर्मचारी के रूप में हाथरस के एक मिल में कार्य किया। अज्ञेय द्वारा संपादित त्रैमासिक प्रतीक (इलहाबाद) के संपादन विभाग में कार्य  करने के बाद आकाशवाणी के प्रयाग, लखनऊ, भोपाल और नई दिल्ली केन्द्रों पर पहले स्क्रिप्ट-लेखन और बाद में कार्यक्रम-अधिकारी और साहित्य अकादमी में सहायक सचिव के पद पर 1960 से 1974 तक कार्य किया। उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में अपने निधन से पूर्व कुछ समय के लिए फैलो रहे।  उनका निधन 23 जून 1975 ई. को शिमला में हुआ॥

भारतभूषण अग्रवाल प्रथमतः कवि थे, किंतु उन्होंने नाटक, उपन्यास, निबंध, आलोचना, बालसाहित्य आदि गद्य का विधाओं मे लिखकर अपनी प्रतिभा को प्रमाणित किया।  वे प्रयोगवाद के प्रमुख कवि थे। उन्होंने अपने व्यंग्य और हास्य से परिपूर्ण मुक्तक लिखकर  हिन्दी के काव्य-साहित्य को एक नई विधा दी। मौलिक लेखन के अलावा रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाटकों और कविताओं का सुन्दर अनुवाद करके अपनी अनुवादकला का सहज परिचय दिया। उनकी प्रमुख रचनाओं मे छवि के बंधन, जागते रहो, तारसप्तक, सहयोगी संकलन, मुक्तिमार्ग, ओ अप्रस्तुत मन, कागज के फूल, अनुपस्थित लोग, एक उठा हुआ हाथ आदि प्रमुख हैं॥


Friday, 2 December 2022

कारक

  



संज्ञा या सर्वनाम को वाक्य से जोडने वाला है - कारक।

जैसे - राम को फल दो।

 घडी दीवार पर है।


हिन्दी में आठ कारक होते हैं।

      कारक                       विभक्ति चिन्ह

कर्ता कारक                            ने

कर्म कारक                             को

करण कारक                           से

संप्रदान कारक                         को, के लिए

अपादान कारक                        से

संबंध कारक                           को, के, की

अधिकरण कारक                      में, पे, पर

संबोधन कारक                         हे ! अरे !


कर्ता कारक  (ने)

क्रिया को करने वाला कर्ता। भूतकाल में ऐसा प्रयोग होता है जैसा - राम ने पाठ पढा।


कर्म कारक (को)

जहाँ क्रिया का फल पडता है वह कर्म कारक है।

जैसा - राम ने रावण को मारा।


करण कारक  (से)

जिस से कर्ता कार्य करता है वह करण कारक है।

जैसे - राजू कलम से लिखता है।


संप्रदान कारक  (को, के लिए)

कुछ देने या करने का पता चलता है वह संप्रदान कारक है।

जैसे - यह पुस्तक राम को दो। 

पीने के लिए पानी दो।


अपादान कारक  (से)

जहाँ पृथकता का पता चलता है वह अपादान कारक है।

जैसे - बच्चे स्कूल से आते है।


संबंध कारक  (का, के, की)

एक से दूसरे वस्तु का संबंध पता चलता है वह संबंध कारक ।

जैसे - राम की बेटी।


अधिकरण कारक  (में, पे, पर)

जहाँ क्रिया का आधार है वह अधिकरण कारक है।

जैसे - दीवार पर घडी है।


संबोधन कारक  (हे ! अरे !)

किसी को संबोधित करने, संबोधन कारक का प्रयोग होता है।

जैसे - हे राम ! 

अरे बच्चों ! 

री बुढिया !

Tuesday, 25 October 2022

लिंग और वचन

 



लिंग - चिन्ह। जिस से संज्ञा शब्द का जाति जाना जाता है वो लिंग कहलाता है।

 लिं ग के दो प्रकार है 

1. पुल्लिंग

 2. स्त्रीलिंग।

 पुल्लिंग = पुरुष जाति के शब्द पुल्लिंग कहलाता है। जैसे  लडका, पहाड .

 स्त्रीलिंग = स्त्री जाति के शब्द स्त्रीलिंग कहलाता है। जैसे लडकी, कलम.


का, के, की से हिन्दी शब्दों के लिंग पहचान जाता है।

उदाहरण = पानी बहता है।

                   ऊँची इमारत।

                  राम की कलम।


वचन = शब्द रूप एक के लिए प्रयुक्त हो, या अनेक के लिए हो उसे वचन कहते है। 

वचन दो प्रकार के है -

1.  एकवचन 

2. बहुवचन।

 एकवचन = जो शब्द एक व्यक्ति या एक वस्तु का हो, उसे  एकवचन कहते है। 

  जैसे घोडा, रोटी, पुस्तक।

 बहुवचन = जो शब्द एक से अधिक व्यक्तियों या वस्तुओं  का हो, उसे बहुवचन कहते है।

  जैसे घोडे, रोटियाँ, पुस्तके।


वचन-परिवर्तन संबन्धी नियमों। 


पुल्लिंग शब्दों के नियम -

 अ को ए बनाना। 

जैसे  बकरा - बकरे, 

       लडका - लडके।

इन शब्दों का बहुवचन नही है। जैसे घर, भाई, डाकू।


स्त्रीलिंग शब्दों के नियम -


 ई को इ बनाना।

 लडकी - लडकियाँ,

 बकरी - बकरियाँ।


 याँ जोडना ।

 जाति - जातियाँ

रीति - रीतियाँ।


एँ जोडना ।

 वस्तु - वस्तुएँ,

 लता - लताएँ।





Friday, 14 October 2022

संज्ञा के भेद

 





जो विकारी शब्द के नाम बताते है, वे संज्ञा है।

संज्ञा के तीन भेद है, वे जातिवाचक संज्ञा,  व्यक्तिवाचक संज्ञा, भाववाचक संज्ञा।

जातिवाचक संज्ञा - जाति के सभी के नाम बताने वाला संज्ञा जातिवाचक संज्ञा है। 

लडका, देश, नदी।

व्यक्तिवाचक संज्ञा - जाति के एक एक व्यक्ति या वस्तु के नाम बताने वाला संज्ञा व्यक्तिवाचक संज्ञा है। 

राम, भक्त, गंगा।

भाववाचक संज्ञा - जाति के व्यक्ति, वस्तु के गुण के नाम बताने वाला संज्ञा भाववाचक संज्ञा है। 

लंबाई, वीरता, क्रोध।


ना, पन, वट, हट, ता, जैसे शब्दों को जातिवाचक संज्ञा, विशेषण, क्रिया शब्दों के साथ अंत में जोड ने से भाववाचक संज्ञा बनती है।

जातिवाचक  -  बच्चा-बचपन

विशेषण       -  साफ-सफाई

क्रिया           -  खेल-खेलना।


Friday, 7 October 2022

विशेषण - हिन्दी व्याकरण का एक मुख्य अंग

 



जो शब्द के विशेषता को प्रकट करते वे विशेषण कहलाते हैं। विशेषण चार प्रकार के हैं।

1. गुणवाचक विशेषण - जो विकारी शब्द के गुण, रूप, रंग, आकार  आदि के विशेषण प्रकट करते हैं, वे          गुणवाचक विशेषण।

    जैसे अच्छा, मीठा, सुन्दर, काला।

2. संख्यावाचक विशेषण - जो विकारी शब्द के संख्या को प्रकट करते  हैं, वे संख्यावाचक विशेषण। 

    जैसे दो आदमी, चार पेड।

3. परिमाणवाचक विशेषण - जो विकारी शब्द के वस्तु के नाप, माप   (या) परिमाण को प्रकट करते हैं, वे           परिमाणवाचक विशेषण। 

      जैसे  थोडा पानी, दो लीटर दूध।

4. सार्वनामिक विशेषण - जब सर्वनाम शब्द संज्ञा के पहले विशेषण   की तरह आते हैं, वे सार्वनामिक                विशेषण। 

      जैसे वह लडका राम है।  वह घर हमारा है। 

      सार्वनामिक विशेषण का दूसरा नाम निर्देशक सर्वनाम है।


Wednesday, 14 September 2022

हिन्दी भाषा के कुछ मूल बातें

 



आज हिन्दी दिवस, आइए इस शुभ अवसर पर हिन्दी भाषा के कुछ मूल बातें जान लें।


 भाषा एक साधन है जिस से मनुष्य अपनी भावनाओं और विचारों को प्रकट करता है।

भाषा दो प्रकार के है - कथित भाषा और लिखित भाषा।

*कथित भाषा - जो बोला और सुना जाता है, वो कथित भाषा है। इसे मौखिक भाषा भी कहा जाता है।

*लिखित भाषा- जो लिखी और पढी जाती है, वो लिखित भाषा है।

 

वर्णमाला - हिन्दी में वर्णों के समूह को वर्णमाला कहते है।

वर्ण दो प्रकार के है - स्वर और व्यञ्जन।

 

व्याकरण एक शास्त्र है जिस से भाषा का शुद्ध रूप मिलता है।  व्याकरण तीन प्रकार के हैः- 1. वर्ण विचार, 2. शब्द विचार, 3. वाक्य विचार।

*वर्ण विचार - वर्णों की बनावट, उच्चारण आदि पर विचार किया जाता है।

*शब्द विचार- शब्दों कि उत्पत्ति, बनावट्, शब्दों के भेद पर विचार किया जाता है।

*वाक्य विचार - वाक्य रचना, उस के भेद और प्रयोगों पर विचार किया जाता है।

 

सार्थक-ध्वनि-समूह को शब्द कहते है। व्युत्पत्ति, बनावट, प्रयोग की दृष्टि से शब्दों का वर्गीकरण किया जाता है।


व्युपत्पत्ति की दृष्टि से शब्द के चार भेद है - 1. तत्सम, 2. तद्भव, 3. देशज और 4. विदेशी शब्द।

*तत्सम शब्द - संस्कृत से जो शब्द हिन्दी में प्रयुक्त होते है,      वे तत्सम शब्द कहलाते है। जैसे सूर्य, अग्नि।

*तद्भव शब्द- संस्कृत से जो शब्द थोडे परिवर्तन के बाद हिन्दी  में प्रयुक्त होते है, वे तत्भव शब्द कहलाते है। जैसे सूरज, आग।

*देशज शब्द - अन्य भारतीय भाषाओं से जो शब्द हिन्दी में प्रयुक्त होते है, वे देशज शब्द कहलाते है। जैसे लोटा, नीर, मीन।

*विदेशी शब्द- विदेशी भाषाओं से जो शब्द हिन्दी में प्रयुक्त होते है, वे विदेशी शब्द कहलाते है। जैसे पेंसिल, बादशाह।

 

रचना या बनावट की दृष्टि से शब्द के तीन भेद है - 1. रूढ शब्द, 2. यौगिक शब्द और 3. योगरूढ शब्द।

*रूढ शब्द - खंड न किये जाने वाले शब्द को रूढ शब्द कहलाते है। जैसे घर, पेड।

*यौगिक शब्द - दो या दो से अधिक शब्दों के योग से यौगिक शब्द बनते है। जैसे पुस्तकालय।

*योगरूढ शब्द- दो या दो से अधिक शब्दों के योग से योगरूढ शब्द बनते है। इनका अर्थ खंड शब्दों से अलग है। जैसे पंकज।


प्रयोग की दृष्टि से शब्द के दो प्रकार है - 1. विकारी शब्द, 2. अविकारी शब्द।

*विकारी शब्द - लिंग, वचन, काल या कारक के कारण से जो शब्द बदलते है, वे विकारी शब्द है। विकारी शब्द चार प्रकार के है 1. संज्ञा, 2. सर्वनाम, 3. विशेषण और 4. क्रिया।

*अविकारी शब्द - लिंग, वचन, काल या कारक के कारण से जो शब्द नही बदलते है, वे अविकारी शब्द है। अविकारी शब्द चार प्रकार के है 1. क्रिया विशेषण, 2. संबंध बोधक, 3. समुच्चय बोधक और 4. विस्मयादि बोधक।


Thursday, 4 August 2022

नादान दोस्त

 


     प्रेमचंद जी का जन्म वाराणसी के समीप लमही नामक गाँव में हुआ था। उन की कहानियों का केंद्र भाव, राष्ट्रीय जागरण और समाज सुधार था। निर्मला, गोदान, प्रेम की वेदी आदि प्रेमचंद जी की मुख्य रचनाएँ हैं।

      इस नादान दोस्त कहानी में बच्चों की तीव्र जिज्ञासा, सहायता की भावना, स्वाभाविक आशंकी और भय आदि का बहुत ही अच्छा वर्णन है। कहानी घटना प्रधान है। कहानी के प्रमुख पात्र केशव और श्यामा है।

      केशव  के घर की कार्निस के ऊपर एक चिडिया ने अंडे दिये थे। केशव और उसकी बहन श्यामा दोनों को अंडे देखने और उन्हें सुरक्षित जगह पर रखने की इच्छा हुई। बहन की मदद से गद्दीदार बिस्तर पर अंडे को रखने और साथ साथ 

पानी की व्यवस्था भी हुई। दोपहर के बाद जब श्यामा ने कार्निस को देखा तो अंडे नीचे गिर कर टूट गये थे। सारी बाते जानने के बाद, माँ ने उन दोनों को समझाया है कि छूने से चिडिये के अंडे गंदे हो जाते है। चिडिया फिर उन्हे नही सेती। ये बात जानने के बाद, बच्चे रो रो कर पछताने लगे।

  कथावस्तु से कहानी का विकास होता है, बाल- मनोविज्ञान ही इस कहानी की कथावस्तु है। कहानी को आगे बढाने में संवाद का अपना विशेष महत्व होता है। यह एक सामाजिक कहानी है। कहानी का शीर्षक नादान दोस्त उचित है। बच्चों की इच्छा और उनकी सवालों का जवाब न मिलना आदि पर ध्यान दिलाना, लेखक का उद्देश्य है। कहानी की भाषा सरल और मुहावरेदार है।

Wednesday, 27 July 2022

राष्ट्रभाषा हिन्दी का महत्व

 


 हर एक राष्ट्र के लिए एक भाषा होती है, जिस में जनता अपनी सभ्यता, संस्कृति, धर्म, चिंतन आदि को व्यक्त करती है, उसे राष्ट्रभाषा कहते है।

किसी राष्ट्र में सर्वाधिक प्रयोग होनोवाली भाषा ही वहाँ की राष्ट्रभाषा होती है। उसकी अपनी भाषा ही उसे उन्नति के शिखरों तक पहुँचासकती है।

हिन्दी को लेकर संघर्ष के कारण सरकार ने भी तत्काल यह व्यवस्था कर दी कि अहिन्दी भाषी राज्य जब तक न चाहे तब तक हिन्दी के स्थान पर अंग्रेजी रहेगी।

हिन्दी के प्रचार के लिए केंद्र ने हिन्दी निर्देशालय की स्थापना की। हिन्दी साहित्य सम्मेलन, नागरी प्रचारिणी सभा,  हिन्दी प्रचारिणी सभा आदि संस्थाओं के द्वारा हिन्दी का प्रचार - प्रसार किया जा रहा है।

राजभाषा घोषित  कर दिये जाने के बाद कुछ राज्यों तथा वहाँ की जनता ने इसका कडा विरोध किया।

मातृभाषा के साथ हिन्दी का ज्ञान संपूर्ण देश की शिक्षा-संस्थाओं में अनिवार्य बनाया जाए।

हमें यह संकल्प करना चाहिए की अपने सभी कार्यों में हिन्दी का ही प्रयोग करे।

Thursday, 14 July 2022

पढना मेरा पसंदीदा है

 


Blogchatter की Bloghop के prompt दो में से एक को चुनकर हिन्दी में लिखकर समर्पित करने की सोची। इस का परिणाम है यह Blog post.  जिस में, मैं लिखने से ज्यादा, पढना पसंद करती हूं यानि लिखने और पढने में, मैं पढने को ही चुनूँगी।  पढने में बडा मजा है और लिखने से पढना आसान भी है। 

किताबों से जो ज्ञान हम प्राप्त करते हैं, जीवन के अनुभव के साथ मिलाकर ही लिख सकते हैं। मेरा मानना है कि पढने से ही पहला अनुभव प्राप्त होता है।

पढना किसी जगह पर भी किया जा सक्ता है। जैसे कि रैल-गाडी, बस, हवाई जहाज, पार्क और बीच, पुस्तकालय, छतपर और जहाँ कहीं भी आपका मन करें।

किताब हाथ में न होने पर भी, बगलवाले के पत्रिका (न्यूज्पेपर), मैगसिनस् उदार लेकर भी पढ लेते हैं। सफर के समय दिखता हुआ पोस्टेर्स, नोटीस् बोर्डस्, अडवेर्टैंस्मेंटस् और छोडी हुई पर्चियां, और मजेदार खबरें तो समोसा या कछोरी को बांधा हुआ कागज में पढते हैं।

पढने से बहुत कुछ सीखते हैं और वह जिन्दगी में काम आता हैं। लिखने केलिए पढना बहुत जरूरी है। पढने केलिए आज कल तरह तरह के माध्यम है। जिस के सही इस्तेमाल से हम कहीं लाभ उठा सकते हैं। सबसे ज्यादा पढने से खुशी और मन को शांति मिलती है।

मैं, पढने और लिखने के बीच पढने को ही मैं प्रथम स्थान देती हूं।

आन से पढो या शान से पढो

पढो तो सही तो जानोगे जिन्दगी का स्वाद।

धूप में पढो या बारिश में पढो

पढो तो पता चलें दुनिया के रंग।

दिन में पढो या रात को पढो

पर दिन में एक बार तो पढो।

मन पसंद पढो

मन हलका होजायेगा।

प्यार से पढो प्यार से लिखो

सीखो, जानो, जशनकरो।

हमेशा Bloghop के संग रहो


(This blogpost is a part of Blogchatters' Blog Hop)

{Prompt: If you had to choose between reading or writing.}


Wednesday, 13 July 2022

एक दोहा - गुरु महिमा की

 


गुरु गोविन्द दोऊ खडे, काके लागूँ पाय ।

बलिहारी गुरू आपने, गोविन्द दियो मिलाय ॥

 

आप यह दोहा पढकर जान गये होंगे कि आज मैं इस दोहे के बारे में क्यों लिख रही हूं। 

जैसे कि आप सब जानते है कि आज गुरुपूर्णिमा है और इस दोहे का सही मतलब और इस्तेमाल इस दिन से ज्यादा और कब उचित होगा।

इस दोहे में कबीरदास ने गुरू कि महिमा और गुरू को भगवान से भी आगे का स्थान देख कर सरल रूप में गुरू को श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान से पहले पूजने को कहते हैं।

आइए, आज का दिन इस दोहे को हमें भेंटने वाले कबीरदास- जी के बारे में छंद बाते जान लें,

कबीरदास संत कवियों में सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं।  उनका जन्म सन् 1398 ई.में हुआ था।  कहा जाता कि उनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था और उस विधवा ने लोकलाज के डर से उन्हें त्याग दिया था।  तब नीरू - नीमा नामक जुलाहा दम्पत्ति ने उनका पालन - पोषण किया।  कबीर गृहस्थ थे।  उनकी पत्नी का नाम लोई और पुत्र तथा पुत्री का नाम कमल और कमाली था। उनकी मृत्यु सन् 1518 ई. में हुई।

कबीर पढे - लिखे नहीं थे। किंतु साधु - सांगत्य और देशाटन से प्राप्त ज्ञान के आधार पर उन्होंनें लोगों को उपदेश दिया था।  उनके शिष्यों ने उनके उपदेशों के संकलन किया था।  उस संकलन का नाम 'बीजक' है। बीजक के तीन भाग है, 1. साखी, 2.सबद, 3. रमैनी।

'साखी' में दोहे और सोरठा हैं।  उसमें उपदेश की बातें मिलती हैं। 'सबद' में उनके सिद्धांतों का प्रतिपादन मिलता है।

'रमैनी' में गूढ - शैली लक्षित होती है।

       कबीरदास निर्गुण - भक्ति के प्रचारक थे। उनकी भक्ति का आधार ज्ञान था। उन्होंने अंध - विश्वास, कुरीतियों, बाह्यडंबरों का डटकर खण्डन किया। उन्होंने जाति - पाँति में विश्वास नही किया।  कबीर उच्च कोटि के रहस्यवादी थे। उन्होंने आत्मा को स्त्री तथा परमात्मा को परमपूरुष का रूप देकर आध्यात्मिक रहस्यवाद की उच्च कोटि की रचनायें की।

 

 कबीर की भाषा सधुक्कडी कहलाती है। उसमें खडीबोली, ब्रज, पूर्वी हिन्दी, अवधी, पंजाबी आदि बोलियों का सम्मिश्रण मिलता है। उनकी भाषा में अनुभूति की सच्चाई एवं तीव्रता मिलती है। उनकी शैली गेय - मुक्तक शैली है। उस में ओज है। उनकी वाणी में उनकी निर्भीकता, अक्खडपन आदि गुण मिलते हैं।

A Name on a Gift: When Giving Becomes a Memory

       Names are special. How special? Perhaps more than we realise. A name is not merely a word given to us. It becomes a part of our ide...