पोंगल अथवा
मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत पावन एवं उल्लासपूर्ण पर्व है। यह
पर्व सूर्यदेव को समर्पित है और प्रकृति, कृषक तथा परिश्रम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रतीक माना जाता है।
जब सूर्य उत्तरायण होता है, तब यह त्योहार जीवन में नवचेतना, आशा और समृद्धि का संदेश लेकर आता है।
दक्षिण भारत
में इसे पोंगल के नाम से बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप
से किसानों से जुड़ा हुआ है, क्योंकि नई
फसल के आगमन पर धरती माता, सूर्यदेव और पशुधन के प्रति आभार
प्रकट किया जाता है। घर-आँगन को स्वच्छ कर रंगोली से सजाया जाता है और नए वस्त्र
धारण किए जाते हैं।
पोंगल के
दिन मिट्टी के बर्तन में दूध और चावल पकाए जाते हैं। जब दूध उफनता है, तो “पोंगलो पोंगल” का जयघोष किया जाता है, जो समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक है। यह क्षण मानो यह
संदेश देता है कि जीवन भी परिश्रम और धैर्य से परिपूर्ण होकर सुख-समृद्धि से भर
उठता है।
मकर संक्रांति
केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का प्रतीक
है, जहाँ मनुष्य प्रकृति के साथ
सामंजस्य स्थापित कर कृतज्ञता, परंपरा और
सामूहिक आनंद का अनुभव करता है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि परिश्रम का फल मीठा
होता है और प्रकृति का सम्मान ही जीवन की सच्ची समृद्धि है।
पोंगल और
मकर संक्रांति पर सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही जीवन में नई आशा, परिश्रम का सम्मान और समृद्धि का उजास फैल जाता है।
यह पर्व
प्रकृति और कृषक के प्रति कृतज्ञता का उत्सव है, जहाँ अन्न, श्रम और संस्कृति एक साथ उल्लास
बनकर खिल उठते हैं।
1. शीर्षक: “उत्तरायण” — सूर्यकांत
त्रिपाठी ‘निराला’ की काव्य-भावना से प्रेरित
सूर्य के
उत्तरायण होते ही पोंगल और संक्रांति
परिश्रम, प्रकाश और नवजीवन का गीत गुनगुनाती है।
2. शीर्षक: “धरती की कृतज्ञता” —
महादेवी वर्मा की संवेदनात्मक शैली से प्रेरित
पोंगल और
संक्रांति धरती की मौन प्रार्थना हैं,
जहाँ अन्न, श्रम और मनुष्य एक-दूसरे के ऋणी बन जाते हैं।
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